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Musings on Migration, Labour, Politics, Dissent etc.

‘बांग्लादेशी घुसपैठिये’ या बांगलाभाषी भारतीय मुसलमान ?

– बोनोजित हुसेन (अनुवाद: योगेन्द्र दत्त)

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Image Courtesy: Abdul Kalam Azad and Abdul Gani

असम के बोडोलैंड टेरिटोरियल ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट्स (बी टी ए डी) में शांति की प्रक्रिया हमेशा ही नाज़ुक और अस्थिर रही है। इस बार यहाँ का अमन-चैन एक बार फिर तार -तार हो गया है। 1 और 2 मई को बीटीएडी कोकराझार और बक्सा ज़िलों मे पूर्वी बंगाली मूल के मुसलमानो के ताज़ा जनसंहार में 46 लोगों की जान जा चुकी है। इससे भी ज़्यादा लोग अभी तक लापता हैं, लिहाज़ा मरनेवालों की तादात और ऊपर भी जा सकती है।

बीटीडीए में एक ख़ास समुदाय के खिलाफ जातीय हिंसा की यह कोई पहली वारदात नहीं है। नब्बे का दशक बोडो संगठनो द्वारा नेपालियों, आदिवासियों और पूर्वी बंगाली  मुसलमानों व हिन्दुओं के खिलाफ बार-बार चलाये गए जातीय सफाये के हिंसक अभियानों का साक्षी रहा है।  2003 में बीटीएडी  गठन के बाद से पूर्वी बंगाली मूल के मुसलमानों को निशाना बनाने का सिलसिला दिन-प्रतिदिन तेज़ होता गया है। इस तरह की घटनाओं मे 2012 के तथाकथित ‘दंगे’ सबसे गौरतलब हैं जिनमे 108 लोग मरे गए थे।  स्थानीय सूत्रों की मानें तो इस हिंसा में मरनेवालों में 79 पूर्वी बंगाली मूल के मुसलमान, 22 बोडो और चार अन्य समुदायों के लोग थे।

इस इलाके में बार-बार एक ही समुदाय को क्यों निशाना बनाया जा रहा है, इस बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है।  लिहाज़ा उसपर हम फिलहाल यहाँ चर्चा नहीं करेगे। (इस बारे देखें ,संजीव बरुआ “असम:दी पॉलिटिक्स ऑफ़ एलेक्टोरल वॉयलेंस”,ऑउटलुकमैगज़ीन, 9 मई 2014)।  हमारे लिये फिलहाल  सवाल यह है कि बीटीएडी में हो रहे इन हत्याकांडों के विमर्श को किस तरह रातोंरात बांग्लादेश की तरफ से हो रही गैरकानूनी घुसपैठ के सवाल में तब्दील कर दिया जाता है। नतीजा यह होता कि इस तरह की हिंसा मे मरने वालों को ‘गैरकानूनी बांग्लादेशी’  कहकर हम अपने आपको तसल्ली देने लगते हैं और इस बात से बेफिक्र हो जाते हैं कि हक़ीक़त की और भी परतें हो सकती हाँ।  फिर भी यदि हम यह मान ही लें कि मरने वाले वाकई “गैर कानूनी बांग्लादेशी”  थे तो भी महज़ 36 घंटे के भीतर 46 लोगों की बर्बर हत्या इंसानियत के खिलाफ एक अपराध तो है ही।

2012 की तरह इस बार भी असमिया समाज के एक बड़े तबके, राष्ट्रीय मिडिया के एक हिस्सेऔर भाजपा  हत्याओं को जायज ठहरने केलिए “गैरकानूनी बांग्लादेशी घुसपैठ” कहवाला देना शुरू कर दिया और फ़ौरन ही हत्याकांड के असली कारणों से ध्यान हटा दिया।  कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कहा कि हत्याकांड में मरने वाले ‘टिड्डी’ जैसे थे। अगर सोशल मिडिया में कोई असमिया समाज के इस पाखंड पर सवाल उठाने की कोशिश करता है तो उसे मौखिक हमलों और गाली -गलौज से चुप करा दिया जाता है। हाल ही मे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की एक असमिया शोधकर्ता के साथ भी असमिया कठमुल्लावादियों ने धमकियों और गाली-गलौज का यही तरीका अपनाया।  और तो और, उसे यहां तक कहा कि अगर उसे इन ‘टिड्डियों’ से इतनी हमदर्दी है तो वह खुद बांग्लादेश जाकर क्यों नहीं बस जाती?

अगर यह सवाल पूछा जाये कि ये कठमुल्लावादी  कैसे जान जातेहैं कि असम ‘गैरकानूनी बांग्लादेशियों’ की बाढ़ में डूबा जा रहा है तो जवाब में हमेशा झुग्गी बस्तियों,जंगलों के आस -पास बसी आबादियों और नदी किनारे बसे  टोलों में मियाओं (बांग्लादेशी मुसलमानो के लिए इस्तेमाल होने वाली गाली) की बढ़ती तादात का हवाला दिया जाता जाता है। यह एक जटिल स्थिति को देखने का अति सरलीकृत नस्लवादी नजरिया है।

यह पता लगाना अभी भी मुश्किल है कि आज बीटीएडी लेक में कुल कितने गैर-दस्तावेजी बांग्लादेशी हैं।  गौरतलब है कि औपनिवेशिक शासकों के उकसावे पर 1901 से 1941 के बीच 10 लाख से ज़्यादा लोग पूर्वी बंगाल से असम आकर बसे थे।  मौजूदा बीटीएडी  इलाका औपनिवेशिक काल के गोलपाड़ा और कामरूप ज़िलों मे हुआ करता था।  लिहजािस बात का ज़िक्र करना ज़रूरी है कि पूर्वी बंगाल के मुसलमान काश्तकार पहले अविभाजित गोलपाड़ा ज़िले में बसे और बाद में यहीं से वे पश्चिमी और मध्य असम के दूसरे इलाकों में गए। गोलपाड़ा ज़िले की दशकीय जनसँख्या वृद्धि 1901-1911 में 30 प्रतिशत थी जबकि इससे पहले के दो  यह क्रमशः 1.4 प्रतिशत और 2 प्रतिशत थी।  1921-1931 में यह वृद्धि दर गिर कर 15.8  प्रतिशत रह गई थी क्योंकि  ज़्यादातर खेती लायक परती ज़मीन पर ये नए प्रवासी खेती करने लगे थे जो 1901-21 के बीच यहाँ आये थे।  जनसँख्या वृद्धि दर में इसलिए भी गिरावट आई क्योंकि बहुत सारे आप्रवासियों को कामरूप और नगाँव ज़िलों में भी बस्ने की सम्भावना  थी।  1921 से 1931 के बीच कामरूप  के बाडपेटा सब डिवीज़न की आबादी में 69 प्रतिशत का ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ।  ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के मुताबिक 1901 से 1931 के बीच अकेले गोलपाड़ा ज़िले में पूर्वीबंगाल से 4.98 लाख मुसलमान आकर बसे थे। लिहाज़ा,यहाँ सवाल यह उठता है -विभाजन से पहले यहाँ आकर बस्ने वाले पूर्वी बंगाली मूल के लाखों मुस्लिम किसानों की अगली पीढ़ियां अब कहाँ हैं? ( इस स्थिति के विस्तृत सांख्यिकीय विश्लेषण के लिए देखें, बोनोजीत हुसैन-’दी बोडोलैंड वॉयलेंस एंड दी पॉलिटिक्स ऑफ़ एक्सप्लेनेशन’, सेमिनार मैगज़ीन , संख्या 640,दिसम्बर 2012)।

असम में पूर्वी बंगाली मूल के मुसलमानों के सामाजिक-आर्थिक विकास के दयनीय स्तर  को देखते हुए शहरी झुग्गी बस्तियों, जंगलों और नदियों के आसपास तथाकथित मियाओं की बढ़ती संख्या और मौजूदगी की एक वजह यह हो सकती हैकि ये लोग लाचारी में अपने गाँव-घर छोड़ कर  रोज़ी-रोटि की तलाश में असमके शहरों और दूसरे इलाकों की तरफ पलायन कर रहे हों। इससे भी अहम बात यह है कि यह पलायन असम के चार इलाकों से हो रहा आतंरिक विस्थापन भी हो सकता है।

चार इलाका ब्रह्मपुत्र और इसकी सहायक नदियों की तलहटियों का इलाका है। औपनिवेशिक काल के आखिरी दशकों में इन चार इलाकों में पूर्वी बंगाली मूल के मुसलमान खेती के लिए  यहाँ आकर बस गए थे।  परन्तु आज़ादी के बाद भी सरकार की उपेक्षा और लापरवाही की वजह से चार इलाके की आबादी की सामाजिक-आर्थिक  स्थितियों में कोई सुधर नहीं आ पाया है। 1992-93 और 2022-03 में  के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण से पता चलता है कि असम की आबादी में चार इलाके की आबादी  9.35 प्रतिशत है।  इस इलाके में जनसँख्या घनत्व 690 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है (असम का कुल जनसँख्या घनत्व 2001 में 340 व्यक्ति प्रति वर्ग किलो मीटर  था ) इस सर्वेक्षण से यह भी पता चला कि 1992-93 से 2002-03 के बीच चार इलाके में साक्षरता दर 15.4 प्रतिशत से केवल 19.31 प्रतिशत तक बढ़ पायी थी (जबकि 2001 में असम की कुल साक्षरता दर 63.25 प्रतिशत थी)। 2002-03 में चार इलाके के 67.90 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे थे और यह संख्या 1992-93 के मुक़ाबले 19 प्रतिशत ज़्यादा थी (2001 में असम मे गरीबी की रेखा से नीचे आबादी कुल 34 प्रतिशत थी )।

ब्रह्मपुत्र और इसकी सहायक नदियों के प्रवाह में आने वाले उतार-चढाव के साथ कुदरती तौरपर बंधे होने की वजह से चार इलाके के लोग बार-बार मिटटी के कटाव और बहाव की समस्या का सामना करते हैं। उनके सामने बार-बार आतंरिक विस्थापनके आलावा कोई रास्ता नही होता। हालाँकि चार इलाकों  से होने वाले विस्थापन के बारेमे ठोस आंकड़े ढूँढना मुश्किल है मगर कुछ सूक्ष्म अध्ययनों से इस इलाके में बाढ़,मृदा स्खलनऔर बाढ़ चक्र का काफी सटीक अंदाज़ा मिलता है। बड़पेटा ज़िले के चार इलाकों मे डॉ गोर्की चक्रवर्ती द्वारा किये गए एक अध्ययन में पाया गया कि “इस दौरान (1989-98) जब असम में कोई बड़ी बाढ़ नहीं आई थी तब भी सर्वेक्षण के दायरे में लिए गए चार इलाके के परिवारों  45 प्रतिशत परिवारों के घर और 51 प्रतिशत ज़मीन बाढ़ की भेंट चढ़ चुकी थी। बाडपेटा ज़िले में ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी बेकी के खादर में पड़ने वाले इलाकों  एक २५ वर्षीय (1980-2004) अध्ययन मेभी यही  पाया गया कि इस दौरान 77 प्रतिशत मकान ज़मीन के कटाव से प्रभावित हुए और 94 प्रतिशत ज़मीन  बाढ़ से नष्ट हो चुकी थी। ” (गोर्की चक्रवर्ती, “असम्स हिंटरलैंड:सोसाइटी एंड इकॉनमी इन द चार एरियस ” आकांक्षा पब्लिशर्स, दिल्ली,2009) । शोचनीय समाजक-आर्थिक स्थिति,मृदा स्खलन और विस्थापन की इस भारी समस्या को देखते हुए चार इलाके  लोगों के पास दूसरे इलाकों की तरफ पलायंन  करने के आलावा और कोई रास्ता नहीं बचता।

जब एक गैर दस्तावेजी बांग्लादेशी प्रवासी और पूर्वी बंगाली मूल के मुस्लिम नागरिक के बीच फरक करना इतना मुश्किल हो तब सवल यह उठता है कि असमिया कठमुल्लावादी और भाजपा के नेता कैसे इतने यकीन के साथ यह ऐलान कर देते हैं कि बालपाड़ा, नरसिहबाड़ी  नारायणगुडी (तीन गाँव,जहाँ हालिया हत्याकांड हुआ है ) के गांववाले वाकई ‘गैरकानूनी बांग्लादेशी’थे?

एक और गौरतलब बात यह है कि इस  को बताने के लिए के लिए कौन से तर्क और तरीके अपनाये जा रहे हैं? असल में गैर-दस्तावेजी बांग्लादेशिप्रवासी और पूर्वी बंगाली मूल के मुस्लिम नागरिकों के बीच फर्क इतना ज़्यादा नहीं है जितना इनके बीच समानता है।  दोनों  शारीरिक और सांस्कृतिक समानताएं साफ दिखती हैं: दाढ़ी, लुंगी, धर्म और भाषा। लिहाज़ा जब हम ‘गैरकानूनी बांग्लादेशी’ कहते हैं तो क्या यह असम में रहने वाले पूर्वी बंगाली मूल के किसी भी मुस्लमान के लिए नस्ली गाली नहीं होती?

यहाँ बेधड़क इस्तेमाल होनेवाले  अक्सर निराधार जुमलों पर गौर करना ज़रूरी है- ‘गेंडो के शिकार में गैरकानूनी बांग्लादेशियों का हाथ है। ‘ ‘वे मासूम आदिवासियों को लूट लेते हैं.’ ‘असम के गाँवों में औरतों का बलात्कार करते हैं, उनको मार डालते हैं। ‘ इन आरोपों के ज़रिये जो गोलबन्दियां हो रही हैं , उनमे एक नए किस्म की तर्कशीलता पैदा हो रहे है जो किसी भी कीमत पर पूर्वी बंगाली मूल के मुसलमानो को “कमतर इंसान”” टिड्डी दल”मनवाने पर आमादा है।  कहनेकी ज़रुरत नहीं कि किसी दूसरे समुदाय को बेकाबू वासना और स्वाभाव से ही आपराधिक प्रवृत्ति वाला “कमतर इंसान” मानना पिछली आधी सदी के दौरान नस्ली सोच की सबसे बड़ी विशेषता रही है।

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This entry was posted on July 6, 2014 by .
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